महाभारत 3.43.21
ततः पितॄन्यथान्यायं तर्पयित्वा यथाविधिमन्दरं शैलराजं तमाप्रष्टुमुपचक्रमे
tataḥ pitṝnyathānyāyaṃ tarpayitvā yathāvidhimandaraṃ śailarājaṃ tamāpraṣṭumupacakrame
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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