महाभारत 3.43.7
दश वाजिसहस्राणि हरीणां वातरंहसाम्वहन्ति यं नेत्रमुषं दिव्यं मायामयं रथम्
daśa vājisahasrāṇi harīṇāṃ vātaraṃhasāmvahanti yaṃ netramuṣaṃ divyaṃ māyāmayaṃ ratham
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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