महाभारत 3.45.13
किं त्वस्य सुकृतं कर्म लोका वा के विनिर्जिताःय एवमुपसंप्राप्तः स्थानं देवनमस्कृतम्
kiṃ tvasya sukṛtaṃ karma lokā vā ke vinirjitāḥya evamupasaṃprāptaḥ sthānaṃ devanamaskṛtam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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