महाभारत 3.45.4
शक्रस्य हस्ताद्दयितं वज्रमस्त्रं दुरुत्सहम्अशनीश्च महानादा मेघबर्हिणलक्षणाः
śakrasya hastāddayitaṃ vajramastraṃ durutsahamaśanīśca mahānādā meghabarhiṇalakṣaṇāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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