महाभारत 3.46.2
वैशंपायन उवाच · vaiśaṃpāyana uvāca
शक्रलोकगतं पार्थं श्रुत्वा राजाम्बिकासुतःद्वैपायनादृषिश्रेष्ठात्संजयं वाक्यमब्रवीत्
śakralokagataṃ pārthaṃ śrutvā rājāmbikāsutaḥdvaipāyanādṛṣiśreṣṭhātsaṃjayaṃ vākyamabravīt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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