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महाभारत 3.46.32
धृतराष्ट्र उवाच · dhṛtarāṣṭra uvāca
किं कृतं सूत कर्णेन वदता परुषं वचःपर्याप्तं वैरमेतावद्यत्कृष्णा सा सभां गता
kiṃ kṛtaṃ sūta karṇena vadatā paruṣaṃ vacaḥparyāptaṃ vairametāvadyatkṛṣṇā sā sabhāṃ gatā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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