महाभारत 3.48.10
ततोऽहं सुहृदां वाचो दुर्योधनवशानुगःस्मरणीयाः स्मरिष्यामि मया या न कृताः पुरा
tato'haṃ suhṛdāṃ vāco duryodhanavaśānugaḥsmaraṇīyāḥ smariṣyāmi mayā yā na kṛtāḥ purā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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