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महाभारत 3.48.17
या सा समृद्धिः पार्थानामिन्द्रप्रस्थे बभूव हराजसूये मया दृष्टा नृपैरन्यैः सुदुर्लभा
yā sā samṛddhiḥ pārthānāmindraprasthe babhūva harājasūye mayā dṛṣṭā nṛpairanyaiḥ sudurlabhā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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