महाभारत 3.48.37
ते धर्मराजेन वृता वर्षादूर्ध्वं त्रयोदशात्पुरस्कृत्योपयास्यन्ति वासुदेवं महारथाः
te dharmarājena vṛtā varṣādūrdhvaṃ trayodaśātpuraskṛtyopayāsyanti vāsudevaṃ mahārathāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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