महाभारत 3.48.7
रामकृष्णप्रणीतानां वृष्णीनां सूतनन्दनन शक्यः सहितुं वेगः पर्वतैरपि संयुगे
rāmakṛṣṇapraṇītānāṃ vṛṣṇīnāṃ sūtanandanana śakyaḥ sahituṃ vegaḥ parvatairapi saṃyuge
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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