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महाभारत 3.52.17
न त्वेनं शक्नुवन्ति स्म व्याहर्तुमपि किंचनतेजसा धर्षिताः सर्वा लज्जावत्यो वराङ्गनाः
na tvenaṃ śaknuvanti sma vyāhartumapi kiṃcanatejasā dharṣitāḥ sarvā lajjāvatyo varāṅganāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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