महाभारत 3.52.19
कस्त्वं सर्वानवद्याङ्ग मम हृच्छयवर्धनप्राप्तोऽस्यमरवद्वीर ज्ञातुमिच्छामि तेऽनघ
kastvaṃ sarvānavadyāṅga mama hṛcchayavardhanaprāpto'syamaravadvīra jñātumicchāmi te'nagha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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