महाभारत 3.53.2
अहं चैव हि यच्चान्यन्ममास्ति वसु किंचनसर्वं तत्तव विश्रब्धं कुरु प्रणयमीश्वर
ahaṃ caiva hi yaccānyanmamāsti vasu kiṃcanasarvaṃ tattava viśrabdhaṃ kuru praṇayamīśvara
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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