महाभारत 3.56.7
आसाद्य तु नलं वीरं पुष्करः परवीरहादीव्यावेत्यब्रवीद्भ्राता वृषेणेति मुहुर्मुहुः
āsādya tu nalaṃ vīraṃ puṣkaraḥ paravīrahādīvyāvetyabravīdbhrātā vṛṣeṇeti muhurmuhuḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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