महाभारत 3.58.1
बृहदश्व उवाच · bṛhadaśva uvāca
ततस्तु याते वार्ष्णेये पुण्यश्लोकस्य दीव्यतःपुष्करेण हृतं राज्यं यच्चान्यद्वसु किंचन
tatastu yāte vārṣṇeye puṇyaślokasya dīvyataḥpuṣkareṇa hṛtaṃ rājyaṃ yaccānyadvasu kiṃcana
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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