महाभारत 3.6.2
सरस्वतीदृषद्वत्यौ यमुनां च निषेव्य तेययुर्वनेनैव वनं सततं पश्चिमां दिशम्
sarasvatīdṛṣadvatyau yamunāṃ ca niṣevya teyayurvanenaiva vanaṃ satataṃ paścimāṃ diśam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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