महाभारत 3.60.7
पर्याप्तः परिहासोऽयमेतावान्पुरुषर्षभभीताहमस्मि दुर्धर्ष दर्शयात्मानमीश्वर
paryāptaḥ parihāso'yametāvānpuruṣarṣabhabhītāhamasmi durdharṣa darśayātmānamīśvara
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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