महाभारत 3.61.109
सा दृष्ट्वैव महासार्थं नलपत्नी यशस्विनीउपसर्प्य वरारोहा जनमध्यं विवेश ह
sā dṛṣṭvaiva mahāsārthaṃ nalapatnī yaśasvinīupasarpya varārohā janamadhyaṃ viveśa ha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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