महाभारत 3.61.75
सत्यवाग्धर्मवित्प्राज्ञः सत्यसंधोऽरिमर्दनःब्रह्मण्यो दैवतपरः श्रीमान्परपुरंजयः
satyavāgdharmavitprājñaḥ satyasaṃdho'rimardanaḥbrahmaṇyo daivataparaḥ śrīmānparapuraṃjayaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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