महाभारत 3.62.37
राजमातुर्वचः श्रुत्वा दमयन्ती वचोऽब्रवीत्समयेनोत्सहे वस्तुं त्वयि वीरप्रजायिनि
rājamāturvacaḥ śrutvā damayantī vaco'bravītsamayenotsahe vastuṃ tvayi vīraprajāyini
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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