महाभारत 3.68.3
श्रावितश्च मया वाक्यं त्वदीयं स महाजनेऋतुपर्णो महाभागो यथोक्तं वरवर्णिनि
śrāvitaśca mayā vākyaṃ tvadīyaṃ sa mahājaneṛtuparṇo mahābhāgo yathoktaṃ varavarṇini
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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