महाभारत 3.70.24बाहुकस्तमुवाचाथ देहि विद्यामिमां मममत्तोऽपि चाश्वहृदयं गृहाण पुरुषर्षभbāhukastamuvācātha dehi vidyāmimāṃ mamamatto'pi cāśvahṛdayaṃ gṛhāṇa puruṣarṣabhaइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें