महाभारत 3.70.5
नलस्तं प्रत्युवाचाथ दूरे भ्रष्टः पटस्तवयोजनं समतिक्रान्तो न स शक्यस्त्वया पुनः
nalastaṃ pratyuvācātha dūre bhraṣṭaḥ paṭastavayojanaṃ samatikrānto na sa śakyastvayā punaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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