महाभारत 3.70.8
सर्वः सर्वं न जानाति सर्वज्ञो नास्ति कश्चननैकत्र परिनिष्ठास्ति ज्ञानस्य पुरुषे क्वचित्
sarvaḥ sarvaṃ na jānāti sarvajño nāsti kaścananaikatra pariniṣṭhāsti jñānasya puruṣe kvacit
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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