महाभारत 3.71.3
ततस्तं रथनिर्घोषं नलाश्वास्तत्र शुश्रुवुःश्रुत्वा च समहृष्यन्त पुरेव नलसंनिधौ
tatastaṃ rathanirghoṣaṃ nalāśvāstatra śuśruvuḥśrutvā ca samahṛṣyanta pureva nalasaṃnidhau
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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