महाभारत 3.71.7
ते श्रुत्वा रथनिर्घोषं वारणाः शिखिनस्तथाप्रणेदुरुन्मुखा राजन्मेघोदयमिवेक्ष्य ह
te śrutvā rathanirghoṣaṃ vāraṇāḥ śikhinastathāpraṇedurunmukhā rājanmeghodayamivekṣya ha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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