महाभारत 3.75.21
तथैव मलदिग्धाङ्गी परिष्वज्य शुचिस्मितासुचिरं पुरुषव्याघ्रं तस्थौ साश्रुपरिप्लुता
tathaiva maladigdhāṅgī pariṣvajya śucismitāsuciraṃ puruṣavyāghraṃ tasthau sāśrupariplutā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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