महाभारत 3.78.15
वेदाक्षहृदयं कृत्स्नमहं सत्यपराक्रमउपपद्यस्व कौन्तेय प्रसन्नोऽहं ब्रवीमि ते
vedākṣahṛdayaṃ kṛtsnamahaṃ satyaparākramaupapadyasva kaunteya prasanno'haṃ bravīmi te
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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