महाभारत 3.79.7
तमृते पुरुषव्याघ्रं पाण्डवा जनमेजयमुदमप्राप्नुवन्तो वै काम्यके न्यवसंस्तदा
tamṛte puruṣavyāghraṃ pāṇḍavā janamejayamudamaprāpnuvanto vai kāmyake nyavasaṃstadā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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