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महाभारत 3.81.2
कुरुक्षेत्रं गमिष्यामि कुरुक्षेत्रे वसाम्यहम्य एवं सततं ब्रूयात्सोऽपि पापैः प्रमुच्यते
kurukṣetraṃ gamiṣyāmi kurukṣetre vasāmyahamya evaṃ satataṃ brūyātso'pi pāpaiḥ pramucyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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