महाभारत 3.81.64
तत्र स्नात्वार्चयित्वा च पितॄन्देवांश्च भारतन दुर्गतिमवाप्नोति वाजपेयं च विन्दति
tatra snātvārcayitvā ca pitṝndevāṃśca bhāratana durgatimavāpnoti vājapeyaṃ ca vindati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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