महाभारत 3.82.135
कालिकासंगमे स्नात्वा कौशिक्यारुणयोर्यतःत्रिरात्रोपोषितो विद्वान्सर्वपापैः प्रमुच्यते
kālikāsaṃgame snātvā kauśikyāruṇayoryataḥtrirātropoṣito vidvānsarvapāpaiḥ pramucyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें