महाभारत 3.82.137
स्नात्वा कोकामुखे पुण्ये ब्रह्मचारी यतव्रतःजातिस्मरत्वं प्राप्नोति दृष्टमेतत्पुरातने
snātvā kokāmukhe puṇye brahmacārī yatavrataḥjātismaratvaṃ prāpnoti dṛṣṭametatpurātane
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें