महाभारत 3.82.25
सप्तगङ्गे त्रिगङ्गे च शक्रावर्ते च तर्पयन्देवान्पितॄंश्च विधिवत्पुण्यलोके महीयते
saptagaṅge trigaṅge ca śakrāvarte ca tarpayandevānpitṝṃśca vidhivatpuṇyaloke mahīyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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