महाभारत 3.82.30
ततो ललितिकां गच्छेच्छंतनोस्तीर्थमुत्तमम्तत्र स्नात्वा नरो राजन्न दुर्गतिमवाप्नुयात्
tato lalitikāṃ gacchecchaṃtanostīrthamuttamamtatra snātvā naro rājanna durgatimavāpnuyāt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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