महाभारत 3.86.4
राजर्षेस्तत्र च सरिन्नृगस्य भरतर्षभरम्यतीर्था बहुजला पयोष्णी द्विजसेविता
rājarṣestatra ca sarinnṛgasya bharatarṣabharamyatīrthā bahujalā payoṣṇī dvijasevitā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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