महाभारत 3.86.8
प्रवेण्युत्तरपार्श्वे तु पुण्ये कण्वाश्रमे तथातापसानामरण्यानि कीर्तितानि यथाश्रुति
praveṇyuttarapārśve tu puṇye kaṇvāśrame tathātāpasānāmaraṇyāni kīrtitāni yathāśruti
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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