महाभारत 3.87.3
निकेतः ख्यायते पुण्यो यत्र विश्रवसो मुनेःजज्ञे धनपतिर्यत्र कुबेरो नरवाहनः
niketaḥ khyāyate puṇyo yatra viśravaso muneḥjajñe dhanapatiryatra kubero naravāhanaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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