महाभारत 3.92.4
वर्धत्यधर्मेण नरस्ततो भद्राणि पश्यतिततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति
vardhatyadharmeṇa narastato bhadrāṇi paśyatitataḥ sapatnāñjayati samūlastu vinaśyati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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