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महाभारत 3.95.21
अगस्त्य उवाच · agastya uvāca
एवमेतद्यथात्थ त्वं तपोव्ययकरं तु मेयथा तु मे न नश्येत तपस्तन्मां प्रचोदय
evametadyathāttha tvaṃ tapovyayakaraṃ tu meyathā tu me na naśyeta tapastanmāṃ pracodaya
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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