महाभारत 3.95.7
दुहितुर्वचनाद्राजा सोऽगस्त्याय महात्मनेलोपामुद्रां ततः प्रादाद्विधिपूर्वं विशां पते
duhiturvacanādrājā so'gastyāya mahātmanelopāmudrāṃ tataḥ prādādvidhipūrvaṃ viśāṃ pate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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