महाभारत 3.95.8
प्राप्य भार्यामगस्त्यस्तु लोपामुद्रामभाषतमहार्हाण्युत्सृजैतानि वासांस्याभरणानि च
prāpya bhāryāmagastyastu lopāmudrāmabhāṣatamahārhāṇyutsṛjaitāni vāsāṃsyābharaṇāni ca
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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