महाभारत 3.98.12
एवमुक्तास्ततो देवा अनुज्ञाप्य पितामहम्नारायणं पुरस्कृत्य दधीचस्याश्रमं ययुः
evamuktāstato devā anujñāpya pitāmahamnārāyaṇaṃ puraskṛtya dadhīcasyāśramaṃ yayuḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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