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महाभारत 3.98.23
चकार वज्रं भृशमुग्ररूपं; कृत्वा च शक्रं स उवाच हृष्टःअनेन वज्रप्रवरेण देव; भस्मीकुरुष्वाद्य सुरारिमुग्रम्
cakāra vajraṃ bhṛśamugrarūpaṃ; kṛtvā ca śakraṃ sa uvāca hṛṣṭaḥanena vajrapravareṇa deva; bhasmīkuruṣvādya surārimugram
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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