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महाभारत 4.10.5
सर्वोपपन्नः पुरुषो मनोरमः; श्यामो युवा वारणयूथपोपमःविमुच्य कम्बू परिहाटके शुभे; विमुच्य वेणीमपिनह्य कुण्डले
sarvopapannaḥ puruṣo manoramaḥ; śyāmo yuvā vāraṇayūthapopamaḥvimucya kambū parihāṭake śubhe; vimucya veṇīmapinahya kuṇḍale
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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