महाभारत 4.15.38
सुदेष्णोवाचकस्त्वावधीद्वरारोहे कस्माद्रोदिषि शोभनेकस्याद्य न सुखं भद्रे केन ते विप्रियं कृतम्
sudeṣṇovācakastvāvadhīdvarārohe kasmādrodiṣi śobhanekasyādya na sukhaṃ bhadre kena te vipriyaṃ kṛtam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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