Loading
महाभारत 4.17.14
सोऽयं द्यूतप्रवादेन श्रिया प्रत्यवरोपितःतूष्णीमास्ते यथा मूढः स्वानि कर्माणि चिन्तयन्
so'yaṃ dyūtapravādena śriyā pratyavaropitaḥtūṣṇīmāste yathā mūḍhaḥ svāni karmāṇi cintayan
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें