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महाभारत 4.2.12
सूर्यः प्रतपतां श्रेष्ठो द्विपदां ब्राह्मणो वरःआशीविषश्च सर्पाणामग्निस्तेजस्विनां वरः
sūryaḥ pratapatāṃ śreṣṭho dvipadāṃ brāhmaṇo varaḥāśīviṣaśca sarpāṇāmagnistejasvināṃ varaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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