महाभारत 4.21.15
समागमार्थं रम्भोरु त्वया मदनमोहितःयथा त्वां नावभोत्स्यन्ति गन्धर्वाः सूर्यवर्चसः
samāgamārthaṃ rambhoru tvayā madanamohitaḥyathā tvāṃ nāvabhotsyanti gandharvāḥ sūryavarcasaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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