महाभारत 4.21.3
यैषा नर्तनशाला वै मत्स्यराजेन कारितादिवात्र कन्या नृत्यन्ति रात्रौ यान्ति यथागृहम्
yaiṣā nartanaśālā vai matsyarājena kāritādivātra kanyā nṛtyanti rātrau yānti yathāgṛham
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें